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Patna High Court News: नालंदा डीएम का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द, राज्य सरकार को एक लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश

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Alam Ki Khabar: पटना हाईकोर्ट ने नालंदा के जिलाधिकारी द्वारा जारी आदेश को कानून के विरुद्ध बताते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने राज्य सरकार को पीड़ित को एक लाख रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये वाद व्यय देने का निर्देश दिया।

पटना, 18 जुलाई। आलम की खबर: पटना हाईकोर्ट ने नालंदा के जिलाधिकारी द्वारा पारित एक आदेश को निरस्त करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि पर्याप्त कानूनी आधार के बिना किसी व्यक्ति को असामाजिक घोषित कर उसकी आवाजाही पर प्रतिबंध लगाना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इसी के साथ न्यायालय ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये मुआवजा तथा 10 हजार रुपये वाद व्यय के रूप में देने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राशि मामले के लिए जिम्मेदार अधिकारी से वसूली जाएगी।

जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद की पीठ ने राजेश कुमार की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए नालंदा के जिलाधिकारी द्वारा 20 मार्च 2026 को पारित आदेश को कानून के अनुरूप नहीं माना। अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ वर्ष 2021 के बाद कोई नया आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ था। इसके बावजूद उन्हें बीसीसीए कानून के तहत असामाजिक तत्व घोषित कर नियमित रूप से सिलाव थाना में हाजिरी लगाने का निर्देश दिया गया था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि केवल पुराने मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बीसीसीए के तहत कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित शर्तों का पालन आवश्यक है। यदि निर्धारित अवधि के भीतर आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी नहीं होतीं तो किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों पर इस प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।

याचिकाकर्ता ने जिलाधिकारी के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न केवल आदेश को रद्द कर दिया बल्कि यह भी कहा कि बिना वैधानिक आधार के पारित आदेश से नागरिक को हुई परेशानी की भरपाई की जानी चाहिए। इसी आधार पर मुआवजा और वाद व्यय देने का निर्देश जारी किया गया।

कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कठोर कार्रवाई करते समय कानून में निर्धारित प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया जाना आवश्यक है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रशासनिक निर्णय भी संवैधानिक और कानूनी दायरे में ही होने चाहिए।

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कानून का पालन प्रशासन की भी जिम्मेदारी

लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है। प्रशासनिक अधिकारियों को कानून के दायरे में रहकर ही निर्णय लेने होते हैं। यदि किसी आदेश से नागरिक के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं और वह कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता, तो न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है। यह फैसला प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

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